जितेन्द्र सिंह जीतू आगरा मंडल प्रभारी शब्द मेल समाचार
मैनपुरी न्यूज -10 जून की शाम उसका पति शराब पीकर घर आया। उसने खाना माँगा। खाना बनने में थोड़ी देर होने पर वह गुस्सा हो गया और पत्नी को गालियाँ देने लगा।
पत्नी ने विरोध किया तो उसका गुस्सा और बढ़ गया। वह बाहर गया, पेड़ की एक मोटी डाल काटकर लाया और पत्नी को उससे बुरी तरह पीटा। उसने उसे लात-घूँसों और थप्पड़ों से भी मारा।
देर रात महिला चुपचाप घर से निकली और पुलिस थाने की ओर चलने लगी। लेकिन रास्ते में मंदिर के पास पति ने उसे देख लिया। उसने लोगों के सामने फिर से उसे पीटा और घसीटकर घर वापस ले आया।
घर पहुँचकर उसने महिला के गले में लोहे की भारी जंजीर डालकर उसे घर के एक खंभे से बाँध दिया और ताला लगा दिया।
इसके बाद उसने गैस पर लोहे की छड़ को लाल होने तक गर्म किया और उससे महिला की कमर, कूल्हे और जाँघ को जला दिया।
महिला दर्द से चीखती रही। वह लगभग 24 घंटे तक जंजीर से बँधी रही।
पति ने उससे कहा कि वह पंचायत के सामने यह वादा करे कि अब कभी पुलिस के पास नहीं जाएगी।
अपनी जान बचाने के लिए महिला ने दिखावे के लिए उसकी बात मान ली। पति पंचायत के लोगों को बुलाने के लिए घर से बाहर चला गया और महिला घर में अकेली रह गई।
उसे पास में एक भारी पत्थर दिखाई दिया। उसने पत्थर से ताला तोड़ा और जंजीर से खुद को आजाद किया। इसके बाद वह 6 किलोमीटर पैदल चलकर पुलिस थाने पहुँची।
पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। यह मंगीबाई तंवर की सच्ची कहानी है और उन अनगिनत महिलाओं की भी, जो आज भी ऐसी क्रूरता सहने को मजबूर हैं।
बहुत-सी महिलाएँ डर, समाज के दबाव, आर्थिक निर्भरता, बच्चों की चिंता या परिवार का सहयोग न मिलने के कारण चुप रहती हैं। यह घटना बताती है कि कभी-कभी केवल पुलिस थाने तक पहुँचने के लिए भी कितनी हिम्मत की जरूरत होती है।
इस कहानी का सबसे शक्तिशाली हिस्सा पति की क्रूरता नहीं है।
सबसे शक्तिशाली पल वह है, जब मंगीबाई ने हार मानने से इनकार कर दिया, पत्थर उठाया, ताला तोड़ा और डर के बजाय आजादी को चुना |
सीमा त्यागी की वॉल से

