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मध्य प्रदेश

M.p.धार में भोजशाला का फैसला हिंदू पक्ष में आने से मुस्लिम पक्ष नाराज़

Shabdmail News
Last updated: May 16, 2026 4:51 am
Shabdmail News
Published: May 16, 2026
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अब मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे news sorce help desek

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला को लेकर वर्षों से चल रहा विवाद अब एक बड़े कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। हाल ही में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भोजशाला परिसर को मां वाग्देवी यानी सरस्वती मंदिर माना है। अदालत ने वर्ष 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा जारी उस व्यवस्था को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी जाती थी। इस फैसले के बाद पूरे देश में भोजशाला विवाद एक बार फिर चर्चा का केंद्र बन गया है। भोजशाला का इतिहास करीब एक हजार वर्ष पुराना माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज ने धार नगरी को शिक्षा और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनाया था। उसी समय भोजशाला की स्थापना हुई, जिसे संस्कृत शिक्षा और मां सरस्वती की आराधना का केंद्र माना जाता था। इसे “विद्या की काशी” भी कहा जाता था। यहां संस्कृत, प्राकृत और नागरी लिपि से जुड़े कई शिलालेख और कलाकृतियां मिली हैं। हिंदू पक्ष का दावा है कि यहां स्थापित मां वाग्देवी की मूर्ति को अंग्रेज शासन के दौरान वर्ष 1875 में लंदन ले जाया गया था, जो आज भी ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है। समय के साथ भोजशाला परिसर को लेकर विवाद बढ़ता गया। मुस्लिम पक्ष इस स्थल को कमाल मौला मस्जिद मानता रहा, जबकि हिंदू संगठनों का कहना था कि मूल रूप से यह सरस्वती मंदिर और गुरुकुल था। आजादी के बाद यह मामला कई बार प्रशासन और अदालतों तक पहुंचा। वर्ष 2003 में एएसआई ने एक व्यवस्था लागू की, जिसके अनुसार मंगलवार को हिंदू पक्ष को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी गई। यही व्यवस्था वर्षों तक जारी रही।

इसके बाद हिंदू संगठनों और कुछ सामाजिक संस्थाओं ने अदालत में याचिकाएं दायर कर यह मांग उठाई कि भोजशाला को पूर्ण रूप से मंदिर घोषित किया जाए और यहां नियमित हिंदू पूजा-अर्चना की अनुमति दी जाए। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष ने इसे मस्जिद बताते हुए यथास्थिति बनाए रखने की मांग की। मामला धीरे-धीरे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा और सुनवाई का दायरा बढ़ता गया।

मार्च 2024 में इस विवाद ने नया मोड़ लिया, जब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराने का आदेश दिया। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI को निर्देश दिया कि वह पूरे परिसर की आधुनिक तकनीक से जांच करे और यह पता लगाए कि मूल संरचना क्या थी। अदालत के आदेश के बाद एएसआई ने करीब 98 दिनों तक विस्तृत सर्वे किया। इस दौरान परिसर की वीडियोग्राफी, संरचनात्मक अध्ययन, खुदाई और पत्थरों व स्तंभों की जांच की गई।

सर्वे के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए। एएसआई की रिपोर्ट में बताया गया कि परिसर में बड़ी संख्या में ऐसे स्तंभ और शिल्प मिले हैं जिन पर हिंदू देवी-देवताओं, मंदिर स्थापत्य और नागर शैली की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। रिपोर्ट में कहा गया कि वर्तमान ढांचे में मंदिर से जुड़े कई अवशेषों का उपयोग किया गया था। एएसआई ने अपनी 2000 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट में दावा किया कि परिसर के नीचे और आसपास मंदिरनुमा संरचना के प्रमाण मौजूद हैं। हालांकि मुस्लिम पक्ष ने एएसआई की रिपोर्ट पर सवाल भी उठाए। उनका कहना था कि रिपोर्ट पक्षपातपूर्ण है और सर्वे का उद्देश्य पहले से तय निष्कर्ष को साबित करना था। मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर कर सर्वे पर रोक लगाने की मांग की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे रोकने से इनकार कर दिया। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि सर्वे जारी रह सकता है, लेकिन परिसर की मूल संरचना को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि सर्वे रिपोर्ट के आधार पर कोई अंतिम कार्रवाई उसकी अनुमति के बिना नहीं की जाएगी। इसके बाद मामला फिर हाईकोर्ट में पहुंचा। इंदौर खंडपीठ में कई महीनों तक लगातार सुनवाई चली। दोनों पक्षों ने ऐतिहासिक दस्तावेज, पुरातात्विक प्रमाण, धार्मिक मान्यताएं और कानूनी तर्क अदालत के सामने रखे। अदालत ने लगभग 36 दिनों तक दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस बहुचर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि भोजशाला मूल रूप से मां वाग्देवी का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र था। कोर्ट ने कहा कि हिंदू पूजा की परंपरा यहां कभी समाप्त नहीं हुई। अदालत ने एएसआई की 2003 वाली व्यवस्था को निरस्त करते हुए परिसर को मंदिर माना। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि विवादित स्थल की ऐतिहासिक प्रकृति तय करने में पुरातात्विक और ऐतिहासिक साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि भोजशाला परिसर में मिले 188 स्तंभ और उन पर बने धार्मिक प्रतीक इस मामले में महत्वपूर्ण सबूत हैं। फैसले के बाद हिंदू संगठनों ने इसे ऐतिहासिक जीत बताया। धार और आसपास के क्षेत्रों में कई स्थानों पर खुशी मनाई गई और धार्मिक आयोजन हुए। वहीं मुस्लिम पक्ष ने कहा कि वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। कानूनी जानकारों का मानना है कि मामला अब सर्वोच्च अदालत तक जा सकता है और वहां अंतिम संवैधानिक व्याख्या होगी।

भोजशाला विवाद केवल धार्मिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का विषय भी बन चुका है। यह मामला देश में उन विवादित धार्मिक स्थलों की बहस को फिर से तेज कर सकता है, जहां इतिहास, आस्था और कानून तीनों एक साथ जुड़े हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का प्रभाव भविष्य में अन्य विवादित स्थलों से जुड़े मामलों पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल भोजशाला परिसर की सुरक्षा बढ़ा दी गई है और प्रशासन पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। अदालत के फैसले के बाद अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगा और वहां इस ऐतिहासिक विवाद का अंतिम अध्याय कैसे लिखा जाएगा।

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