सुबोध कुमार वर्मा
हवा और पानी सभी प्राणियों के जीवन के अनिवार्य तत्व हैं इनको सुरक्षित और संरक्षित करने में ही मनुष्य की भलाई है-
प्रकृति के पांचों तत्वों जल वायु अग्नि पृथ्वी और आकाश में से किसी एक का भी संतुलन बिगड़ते ही मनुष्य और प्रकृति की व्यवस्था स्वत: बिगड़ जाती है। शरीर में इन तत्वों का संतुलन बिगड़ते ही गम्भीर विकार आ जाते हैं- सुबोध कुमार वर्मा
जब तक हम जल जंगल और ज़मीन के प्रति भावनात्मक रूप से समर्पित होकर काम नही करेंगे तब तक सकारात्मक परिणाम आने वाले नही है। प्रकृति को सिर्फ भाव चाहिए।
नदियों की अविरलता स्वच्छता और सुरक्षा के साथ उनका विस्तार भारतीय संस्कृति को बचाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। हमारे जीवन और संस्कृति में जल का विशेष महत्व है लेकिन आज हम इसकी सुरक्षा के प्रति गम्भीर नही हैं। इसका महत्वपूर्ण कारण समाज में जल संस्कृति के प्रति जागरूकता का अभाव है, स्कूलों में छात्रों को जल जंगल जमीन से जोड़ने वाली पद्धति की कमी है। इसके लिए स्कूलों में बच्चों को प्रतिदिन जल जंगल और ज़मीन के महत्व को समझाना होगा पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करने के लिए प्रयास किया जाना चाहिए। लेकिन ध्यान रखें ये प्रयास भावयुक्त होने चाहिए न कि मात्र कागजी औपचारिकता। वास्तव में जब तक हम जल जंगल और ज़मीन के प्रति भावनात्मक रूप से समर्पित होकर काम नही करेंगे तब तक सकारात्मक परिणाम आने वाले नही है। प्रकृति को सिर्फ भाव चाहिए। हरेक प्राणी के लिए जल जंगल और ज़मीन जीवन के अनिवार्य तत्व हैं जिनके बिना जीवन सम्भव नही है। इनको सीमाओं में नही बांधा जा सकता लेकिन मनुष्य यही काम करने में लगा हुआ है। वर्तमान समय में मनुष्य के अन्दर अति भोगवादी प्रवृत्ति तेजी से पनपी है उसके पास भाग-दौड़ भरी जिंदगी में अपने अलावा किसी भी विषय पर सोचने समझने का समय नही है। लेकिन यह उसकी मूर्खता का सबसे बड़ा प्रमाण है क्योंकि प्रकृति के पांचों तत्वों जल वायु अग्नि पृथ्वी और आकाश में से किसी एक का भी संतुलन बिगड़ते ही मनुष्य और प्रकृति की व्यवस्था स्वत: बिगड़ जाती है। शरीर में इन तत्वों का संतुलन बिगड़ते ही गम्भीर विकार आ जाते हैं। ध्यान रखें कि यदि प्रकृति का स्वास्थ्य बिगड़ेगा तो सभी प्राणियों का स्वास्थ्य स्वत: ही बिगड़ जायेगा। इसके लिए कोई ओर जिम्मेदार नही मनुष्य स्वयं जिम्मेदार है। मनुष्य सभी जीवों में बुद्धिमान प्राणी है इसलिए उसको ही सोचना है पशु पक्षी तो प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन यापन करते हैं लेकिन मनुष्य अपने ज्ञान का विवेक पूर्ण प्रयोग करने में सफल नही हुआ है। सब कुछ जानते हुए भी वह जानबूझकर अनजान बना हुआ है। वास्तव में नदियों की अविरल धारा और उसके वेग को रोकने की सामर्थ्य किसी में नही है। अल्पकालीन व्यवस्था के द्वारा मनुष्य ऐसा करने में सफल हो भी जाए तो भविष्य में इसके गम्भीर खतरे को अधिक समय तक टाला नही जा सकता। नदियों पर बड़े बड़े बांध बनाकर मनुष्य अपनी योग्यता का प्रदर्शन करने में लगा हुआ है जबकि उसे समझना चाहिए कि जितना बड़ा बांध होगा खतरा भी उतना ही गम्भीर होगा यह तय है। एक तरफ जब छोटी नदियों से भी मनुष्य की ऊर्जा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव है तो बड़े बांधों के निर्माण का क्या औचित्य है। बड़े बांध तो मनुष्य की बेबकूफी के स्मारक हैं। पूज्य गुरुदेव श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी ने टिहरी डैम को 21वीं सदी का मनुष्य की मूर्खता का स्मारक कहा था क्योंकि वह जानते थे कि इस बांध से भविष्य में मानव जीवन सुरक्षित नही रहेगा और पशु पक्षियों जीव जगत भी सुरक्षित नही रह सकेगा। इस बांध का लाभ अल्प समय तक जरूर मिलेगा लेकिन भविष्य के खतरे गम्भीर होंगे। तमाम अनशन और आन्दोलनों के बीच बांध का निर्माण तो हो गया लेकिन अब सुरक्षा और खतरे पर मंडराते संकटों के बादलों को कौन रोक सकता है ये चिन्ता का विषय है। विदेशों में बड़े बांधों के ख़तरों को भाप कर तोड़ा जा रहा है वहीं हमारे देश में इनके निर्माण पर गर्व किया जा रहा है। यही हमारी मूर्खता है। हमको तो छोटी नदियों को सुरक्षित और संरक्षित करना चाहिए। जरा सोचिए अविरल बहती नदियों की सुरीले मधुर संगीत की आवाज़ नदियों के किनारे लगे वृक्षों पर चहकते पक्षियों का संगीत आज हमारे घरों में कितने कानों में गूंजती है। कम से कम युवा पीढ़ी तो इससे पूरी तरह अनभिज्ञ है। प्रातःकाल का उगता हुआ सूरज कितने युवाओं ने देखा है ये भी सोचिए। युवावस्था बीतने के बाद डाक्टर की सलाह पर जल्दी उठकर व्यायाम और सूर्योदय के दर्शन करना उसकी मजबूरी बन जाता है। लेकिन जीवन का अधिकांश समय तो गंवा दिया व्यर्थ की भागदौड़ में। ये जीवन की वो सच्चाई है जिससे मुंह नही मोड़ा जा सकता है। इसलिए अभी समय है कि प्रकृति जल जंगल और ज़मीन की पीड़ा को समझें और उसको कम करने का सामूहिक प्रयास करें। प्रकृति का चक्र संतुलित व्यवहार का संदेश देता है यह संतुलन बनाए रखना मनुष्य का दायित्व है। इस दायित्व के निर्वहन का पहला कदम जल जंगल और ज़मीन के प्रति संवेदनशील समाज का निर्माण करना है। समाज में वृक्षों और जल के प्रति आदर और सम्मान का भाव पैदा करना होगा। यदि ऐसा करने में हम सफल नही होते हैं तो जीवन व्यर्थ ही होगा। याद रखिए प्रकृति को अपनी व्यवस्था बनाए रखना आता है लेकिन मनुष्य के अन्दर ऐसी स्थिति को झेलने की सामर्थ्य नही है। प्रकृति के पास मनुष्य की हर समस्या का समाधान है आवश्यकता मात्र प्रकृति के अनुकूल जीवन पद्धति को अपनाने की है। मनुष्य का लोभ और भोगवादी प्रवृत्ति उसके लिए अब खतरे की घंटी बन चुका है। मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार सीमित साधनों और संसाधनों के उपभोग की अनुमति तो प्रकृति स्वयं ही देती है लेकिन उसके लालच को पूरा करना अब प्रकृति के वश में नही है। यदि पेड़ों और जंगलों को नही बचाया तो वह दिन दूर नही जब आक्सीजन की बोतल भी साथ लेकर चलना मनुष्य की विवशता बन जाएगी। हवा और पानी सभी प्राणियों के जीवन के अनिवार्य तत्व हैं इनको सुरक्षित और संरक्षित करने में ही मनुष्य की भलाई है।
सुबोध कुमार वर्मा प्रख्यात पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सहयोगी विश्वविख्यात पर्यावरणविद् और चिपको आन्दोलन के प्रणेता पद्मविभूषित श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी।

