शब्द मेल समाचार की ख़ास रिपोर्ट
आज हम आपको एक ऐसे शिव मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जो महज एक ही रात में बनाकर तैयार किया गया है । हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में भोजपुर मंदिर की यह मंदिर एक ही रात्रि में राजा भोज द्वारा बनवाया गया था यह मंदिर विशाल और ऐतिहासिक धरोहर है जहां हर दिन सैकड़ो की तादात में पर्यटक और शिव भक्त आते हैं
भोजपुर शिव मंदिर (भोजेश्वर मंदिर), जो मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 32 किलोमीटर दूर स्थित है, अपने आप में कई रहस्यों और वास्तुशिल्प के चमत्कारों को समेटे हुए है। इसे “उत्तर भारत का सोमनाथ” भी कहा जाता है।
यहाँ इस मंदिर से जुड़े कुछ प्रमुख रहस्य और रोचक तथ्य दिए गए हैं:
1. एक ही रात में निर्माण की कथा
जनश्रुतियों के अनुसार, राजा भोज द्वारा बनवाया गया था विशाल मंदिर का निर्माण एक ही रात में किया जाना था। मान्यता है कि इसका निर्माण स्वयं पांडवों द्वारा (माता कुंती की पूजा के लिए) या राजा भोज के शासनकाल में किया गया था। कहा जाता है कि सूर्योदय होने तक मंदिर का शिखर पूरा नहीं हो पाया था, इसलिए इसे अधूरा ही छोड़ दिया गया। जो अभी तक अधूरा है अनेकों शिल्पकार आये ओर असफल हो कर चले गए लेकिन मन्दिर का शिखर पूरा न कर सके
2. विश्व का विशालतम शिवलिंग
भोजपुर मंदिर का मुख्य आकर्षण यहाँ स्थापित विशाल शिवलिंग है।
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यह एक ही पत्थर (एकाश्म) से बना हुआ है।
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इसकी ऊंचाई लगभग 5.5 मीटर (18 फीट) और व्यास लगभग 2.3 मीटर (7.5 फीट) है।
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इतने विशालकाय पत्थर को उस युग में मंदिर के भीतर स्थापित करना आज भी इंजीनियरों के लिए शोध का विषय है।
. अधूरा शिखर: एक पहेली
मंदिर का आधार और स्तंभ तो पूरी तरह तैयार हैं, लेकिन इसका शिखर अधूरा है। शिखर का निर्माण क्यों रोका गया, इसका कोई ऐतिहासिक लिखित प्रमाण नहीं मिलता। कुछ विद्वानों का मानना है कि छत का वजन स्तंभों की सहने की क्षमता से अधिक हो रहा था, जिसके कारण निर्माण कार्य बीच में ही रोकना पड़ा । एक कथा अनुसार यह भी मान्यता है की मदद मन्दिर का निर्माण करते हुए सुबह हो गई और मुर्ग ने बांग देदी जिसके कारण मन्दिर का कार्य अधूरा ही रह गया
. प्राचीन “ब्लूप्रिंट” (नक्शे)
भोजपुर मंदिर के आसपास के पत्थरों पर मंदिर की योजना और डिजाइन के चित्र खुदे हुए हैं। ये दुनिया के सबसे पुराने वास्तुशिल्पीय नक्शों में से एक माने जाते हैं। इनसे पता चलता है कि प्राचीन काल के शिल्पकार निर्माण से पहले पत्थरों पर ही मंदिर का पूरा खाका तैयार करते थे।
. पत्थरों को ऊपर ले जाने की तकनीक
मंदिर के ठीक पीछे एक विशाल ढलान बना हुआ है। माना जाता है कि इसी ढलान के जरिए भारी पत्थरों को खींचकर मंदिर के ऊपरी हिस्से तक पहुँचाया जाता था। यह प्राचीन इंजीनियरिंग का एक बेजोड़ नमूना है।
. लोहे के कुंडे और जोड़
इस मंदिर के निर्माण में सीमेंट या चूने का प्रयोग नहीं किया गया है। पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए लोहे के कुंडों का उपयोग किया गया था। सदियां बीत जाने के बाद भी यह संरचना मजबूती से खड़ी है।
निष्कर्ष:एक कथा अनुसार यह भी मान्यता है की मदद मन्दिर का निर्माण करते हुए सुबह हो गई और मुर्ग ने बांग देदी जिसके कारण मन्दिर का कार्य अधूरा ही रह गया भोजपुर का यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय विज्ञान और वास्तुकला की शक्ति का प्रतीक है। इसका अधूरा होना ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता और रहस्य है, जो पर्यटकों और इतिहासकारों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

