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आदिवासी किसान का न्याय हुआ बंदी! 7 महीने से सीमांकन के लिए भटक रहा किसान, डिप्टी साहब पर जांच रोकने के गंभीर आरोप”

Shabdmail News
Last updated: June 22, 2026 2:16 pm
Shabdmail News
Published: June 22, 2026
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रोशन यादव शब्द मेल समाचार छत्तीसगढ़

खेती का समय सिर पर, लेकिन जमीन का सीमांकन अधर में… प्रशासनिक उदासीनता से किसान बेहाल

लैलूंगा। विकासखंड लैलूंगा के ग्राम ऐंकरा निवासी आदिवासी किसान जगदीश सिदार अपनी ही जमीन के सीमांकन के लिए पिछले सात महीनों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। किसान का आरोप है कि दिसंबर 2025 में तहसील कार्यालय में भूमि सीमांकन हेतु आवेदन देने के बाद भी आज तक उनकी समस्या का समाधान नहीं हो सका है।

जानकारी के अनुसार, किसान ने दिसंबर 2025 में पहली बार और फरवरी 2026 में दूसरी बार सीमांकन के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था। उस दौरान तहसीलदार द्वारा जल्द कार्रवाई का आश्वासन दिया गया, लेकिन समय बीतता गया और सीमांकन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी।

पीड़ित किसान ने अपनी समस्या को लेकर जनसमस्या निवारण शिविर मुकडेगा, लैलूंगा, नारायणपुर, दो बार तहसीलदार कार्यालय तथा एक बार कलेक्टर कार्यालय रायगढ़ तक गुहार लगाई, लेकिन परिणाम अब तक शून्य बताया जा रहा है।

डिप्टी अधिकारी पर सीमांकन रुकवाने का आरोप

किसान का आरोप है कि उच्च अधिकारियों द्वारा मामले की जांच की जिम्मेदारी डिप्टी अधिकारी संतोष यादव को सौंपी गई, लेकिन जांच आगे बढ़ने के बजाय और उलझ गई। किसान का कहना है कि 14 अप्रैल को जब पटवारी आनंद खेश द्वारा सीमांकन की प्रक्रिया शुरू की जा रही थी, तब डिप्टी अधिकारी ने उसे रोक दिया था।

पीड़ित पक्ष का आरोप है कि उन्हें बार-बार “अपने तरीके से जांच करेंगे” कहकर टाल दिया जा रहा है, जिससे उनका मामला महीनों से लंबित पड़ा हुआ है।

खेती का मौसम आया, न्याय अब भी दूर

मानसून के आगमन और खेती-किसानी के महत्वपूर्ण समय के बीच सीमांकन न होने से किसान की चिंता बढ़ गई है। किसान का कहना है कि जमीन की स्थिति स्पष्ट न होने के कारण खेती कार्य प्रभावित हो रहा है और आर्थिक नुकसान की आशंका भी बढ़ती जा रही है।

क्या एक आदिवासी किसान को अपनी ही जमीन का सीमांकन करवाने के लिए महीनों तक दर-दर भटकना पड़ेगा?

क्या प्रशासनिक लापरवाही और जांच के नाम पर देरी से किसान का अधिकार छीना जा रहा है?

जब खेती का समय सामने है, तब जिम्मेदार अधिकारी आखिर कब जागेंगे?

ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द सीमांकन नहीं हुआ तो किसान के साथ-साथ पूरे क्षेत्र में प्रशासन की कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल खड़े होंगे। अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि पीड़ित किसान को आखिर कब न्याय मिलता है।

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