शिक्षा जैसा गम्भीर विषय सीधे तौर पर राष्ट्र के भविष्य और हितों से जुड़ा हुआ है। इस विषय पर किसी भी प्रकार की कोई राजनीति नही होनी चाहिए- सुबोध कुमार वर्मा
आधुनिक शिक्षा ने बच्चों को माता-पिता परिवार सभ्यता संस्कृति समाज और राष्ट्र के बारे में सोचने से भटका दिया है। टूटते रिश्ते बिखरते परिवार इसी शिक्षा की देन है।
आमतौर पर पर्यावरण के प्रति समर्पित लोगों के बारे में उनका नाम मस्तिष्क पटल पर आते ही प्रायः एक अधूरी धारणा बन जाती है कि इस व्यक्ति का काम तो सिर्फ पेड़ पौधों पर्यावरण के संरक्षण की बातों तक ही सीमित है। वास्तव में यह गलत सोच है क्योंकि जो लोग पर्यावरण के प्रति समर्पित हैं उन्हें समाज और प्रकृति दोनों ही स्तरों पर सकारात्मक वातावरण तैयार करने की जिम्मेदारी होती है। सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण को स्वस्थ और समृद्ध बनाने के लिए उनका हरेक कार्य राष्ट्र हित के सरोकारों से जुड़ा होता है। वैश्विक कल्याणकारी भावनाओं के साथ सब प्रकार के भेद भाव से रहित उनका चिन्तन मनन सिर्फ सभी प्राणियों की रक्षा और मंगल के लिए होता है। वर्तमान समय में शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के विषय बहुत चिन्ता जनक हैं। इन विषयों पर समाज के प्रत्येक व्यक्ति को गहन चिंतन मनन की आवश्यकता है। इन दोनों ही विषयों पर आज जो भी स्थिति हमारे सामने है वह खतरे की घंटी है। हमारे ही देश ने सम्पूर्ण विश्व को शान्ति शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण का सन्देश दिया है। आश्रम पद्धति के स्कूल तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय चरक सुश्रुत वागभट्ट नागार्जुन और पतंजलि न जाने कितने ही अनगिनत नाम इसके प्रमाण रहे हैं। पहले के समय में व्यक्ति मालिक बनकर जीता था उसमें व्यवहारिक ज्ञान था। मन मस्तिष्क से स्वस्थ व्यक्ति की सोच दूरगामी और स्पष्ट होती थी। संसाधन और महत्वाकांक्षाएं सीमित थीं इसलिए व्यक्ति संतुष्ट रहता था। लेकिन आजादी के साथ ही हम मैकाले की आधुनिक शिक्षा और पाश्चात्य संस्कृति की गिरफ्त में जकड़ते चले गये जिसके घातक परिणाम आज हमारे सामने हैं। शान्ति शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण की भाषा सरल और सहज होनी चाहिए ताकि ज़मीन पर काम करने वालों की समझ में आये। ज्यादा समय नही हुआ है लेकिन गांधी के चिन्तन में शान्ति शिक्षा और पर्यावरण प्रमुख थे। इन दोनों विषयों के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट तथा दूरगामी था। गांधी जी हमेशा पर्यावरण संरक्षण और बुनियादी शिक्षा के साथ गांवों को मजबूत करने तथा स्वाबलंबन के पक्षधर रहे ताकि देश के गांव हर दृष्टिकोण से समृद्ध हों और राष्ट्र का विकास हो सके। उन्होंने गांव की खुशहाली और समृद्धि को राष्ट्र के विकास की बुनियाद माना था। उन्होंने अन्तिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के विकास को राष्ट्र के विकास का पैमाना माना था इसलिए सरकार से पंचायती राज की वकालत की थी ताकि ग्रामीण स्तर पर लोगों का जीवन सुख समृद्धि और खुशहाली से भरा पूरा हो सके। लेकिन गम्भीर चिन्तन और मनन का विषय है कि जनहित तथा राष्ट्रहित से सीधे जुड़े हुए ये दोनों ही विषय आज आंकड़ों के खेल में उलझे हुए हैं। दूरस्थ गांव के अन्तिम छोर पर बैठे व्यक्ति की समृद्धि और खुशहाली गांधी का सपना था। उनका मानना था कि विकास की बयार गांवों से शहरों की तरफ बहनी चाहिए ताकि सबसे पहले हमारे ग्रामीण अंचल हर दृष्टिकोण से समृद्ध हो सकें। लोगों की दैनिक आवश्यकताओं की प्रत्येक वस्तु गांव की सीमा में ही उपलब्ध हो ताकि उनको शहरों की ओर पलायन के लिए विवश न होना पड़े। लेकिन गांधी का ये सपना सिर्फ सपना ही बनकर रह गया है। इस सपने के अधूरेपन का मुख्य कारण वर्तमान समय में शिक्षा का व्यवसायीकरण होना है। आज शिक्षा की दशा और दिशा चिंता का विषय है। मैकाले की शिक्षा केवल नौकर बना रही है मालिक नही। तीन अंगुलियों तक इसका उपयोग सीमित हो गया है क्योंकि अच्छी से अच्छी शिक्षा ग्रहण करने वाला व्यक्ति बढ़ती हुई महत्वाकांक्षाओं के साथ केवल नौकरी पाने तक ही इसका उपयोग कर पाता है बाद में उसको केवल वही करना होता है जो मालिक चाहता है। व्यक्ति महंगी शिक्षा ग्रहण करने के बाद भी अपने ज्ञान और विवेक का इस्तेमाल अपनी मर्जी से नही कर सकता है। उसके मन और मस्तिष्क पर ताला जड़ने वाली मैकाले की आधुनिक शिक्षा ने लाखों रूपया खर्च के बाद भी परिवार और समाज को क्या दिया ये प्रश्न समाज के हर व्यक्ति को स्वयं से पूछना होगा। जरा सोचिए कान्वेंट स्कूल में प्री प्राइमरी से लेकर बारहवीं क्लास तक के सफर में अपने उम्र के महत्वपूर्ण उन्नीस बीस वर्षों तक बच्चों ने केवल जल्दबाजी में सुबह का थोड़ा नाश्ता और लंच में एक समय टिफिन का सीमित भोजन ही किया है। शाम का भोजन होमवर्क की चिन्ता और तनाव की भेंट चढ़ गया। इस उथल-पुथल भरी जीवन यात्रा में कितने बच्चों ने माता पिता को भोजन के समय पानी तक दिया हो या उनके साथ बैठकर भोजन किया हो, परिवार की स्थिति के बारे में सोचा हो ये बात हरेक व्यक्ति महसूस कर सकता है। इसके बाद जीवन के अगले पड़ाव की शुरूआत होती है अब तक पनपी हुयी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की जिद महंगी कोचिंग में प्रवेश और आईआईटी में प्रवेश का सपना। माता पिता बच्चों के आगे पंगु बनकर उनकी हर इच्छा को किसी न किसी तरह पूरा करते रहते हैं। यहां ये बात बहुत ही महत्वपूर्ण है कि लाखों बच्चों ने कोचिंग में प्रवेश भी ले लिया लेकिन आईआईटी मेडिकल कालेज तथा अच्छे कहे जाने वाले शिक्षण संस्थानों में प्रवेश की सीटें तो मात्र हजारों तक ही सीमित हैं इनमें प्रवेश पाने वाले बच्चों को छोड़कर अधिकांश बच्चों की पारिवारिक स्थिति अनुकूल नही होती। कान्वेंट शिक्षा तथा कोचिंग की उठा-पटक चिन्ता और तनाव भरे जीवन में अधिकांश बच्चे और उनके माता पिता अब तक इस महंगी शिक्षा के लिए अपने खून पसीने की गाढ़ी कमाई को बड़ी तादाद में लुटा बैठते हैं, बढ़ी हुई महत्वाकांक्षाओं और तनाव के बीच बच्चों की शारीरिक और प्रतिरोधक क्षमता जबाव देने लगती है। डिग्री लेने वाले बच्चों के जीवन के महत्वपूर्ण चौबीस बर्ष उथल-पुथल में बीत गये और लाखों रूपया खर्च हो गया लेकिन अभी मिला कुछ नही है। अभी न तो बच्चे को नौकरी मिली और न ही माता पिता को राहत मिली है। एक तरफ तनाव और घटी हुई प्रतिरोधक क्षमता के कारण आईआईटी एनआईटी कैम्पस में कुछ बच्चे अवसाद का शिकार होकर जीवन यात्रा को समाप्त कर बैठते हैं। इन कैम्पस में पिछले कुछ वर्षों का बच्चों की मौत का आंकड़ा देख लिया जाये तो दिल दहल जाता है। वास्तव में यही बच्चे समाज और राष्ट्र की तस्वीर बदल सकते थे यदि उन पर बढ़ी हुई महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने का बोझ न होता। जो बच्चे आईआईटी एनआईटी से डिग्री लेने में सफल हो गये वो विदेश चले जाते हैं। बहाना ये कि यहां स्कोप नही है। माता पिता या देश को उन्होंने क्या दिया ये सवाल चिन्तन और मनन करने का है दूसरी तरफ जो बच्चे मेडल के साथ डिग्री पूरी करने में सफल हो गये वो प्राइवेट नौकरी की दौड़ में इनके साथ शामिल हो गये। यहां से प्रतिस्पर्धा और तेज हो जाती है अब तक की शिक्षा ने बच्चों को माता पिता परिवार सभ्यता संस्कृति समाज और राष्ट्र के बारे में सोचने से भटका दिया उनमें सिर्फ पैकेज की चाह रह गयी। सब कुछ दांव पर लगाकर भी नौकरी चाहें कितने की मिले करनी वही गुलामी है। ये बात समृद्ध घरों के उन शिक्षित बच्चों की है जिनके कम पढ़े लिखे माता पिता लाखों और करोड़ों की सम्पत्ति के मालिक बने हुए हैं। गांव में जिनके यहां सुबह से शाम तक कितने लोग भोजन करके चले जाते हैं उनका कोई हिसाब नही रहता है उन्हीं के बच्चे इस महंगी और संस्कार विहीन शिक्षा को पाने के बाद भी घरों में रोटियां गिन कर बनाते हैं और खाते हैं। इस शिक्षा का सबसे ख़तरनाक परिणाम भरे पूरे संयुक्त परिवार परिपाटी को नष्ट कर एकल परिवार की उपज के रूप में हम सबके सामने है। इसी एकल परिवार परिपाटी ने मजबूत से मजबूत परिवार और उसमें रहने वाले लोगों को तोड़ दिया है। परिवार और समाज को इससे कुछ मिला है तो वह है सब कुछ लुटाने के बाद मिला अकेलापन। अपनों से बिछड़ा हुआ और अन्दर से टूटा हुआ इंसान हमेशा जीतकर भी जिन्दगी की जंग हार जाता है। मैकाले की इस शिक्षा ने इन्सान के दिलों दिमाग पर ताला जड़ दिया हमारी सभ्यता और संस्कृति पर गहरी चोट ने परिवार समाज और राष्ट्र की रीढ़ पर असहनीय पीड़ा और घाव ही दिये हैं। लोगों को शिक्षा की मंहगाई का अहसास न हो इसके लिए एजूकेशन लोन सर्व सुलभ है। लोन लेने की यह प्रवृत्ति इन्सान की जिन्दगी ईएमआई की भेंट चढ़ा देती है। जिसके कारण हर व्यक्ति कर्ज में आसानी से डूब जाता है। तो जरा सोचिए कि हमने खुद अपने आप को और अपनी पीढ़ी को अनजाने में ही इस चक्रव्यूह में फंसा दिया है जिसमें तनाव के अलावा कुछ नही है। शिक्षा से स्वास्थ्य की रक्षा और स्वाबलंबन की प्रवृत्ति को बल मिलना चाहिए जिससे परिवार और समाज और राष्ट्र का विकास हो। इसलिए हमें लौटना होगा गांधी की बुनियादी शिक्षा और आश्रम पद्धति आधारित सभ्यता और संस्कृति को पुष्ट करने वाली भारतीय शिक्षा प्रणाली की ओर। ये काम जितना जल्दी होगा हम उतनी ही जल्दी सुरक्षित हो जायेंगे। आज वास्तव में वही सुखी और समृद्ध है जो आधुनिक शिक्षा से बचा हुआ है ऐसा व्यक्ति मालिक बनकर जीता है। इसलिए हमें आश्रम पद्धति आधारित शिक्षा को अपनाना होगा ताकि शिक्षा की उपज से ऐसे मालिक बनें जिनमें परिवार समाज और राष्ट्र के प्रति सम्मान का भाव हो। वर्तमान समय में शिक्षा के व्यवसायीकरण पर प्रभावी रोक लगनी चाहिए।


