लेखक सुबोध कुमार वर्मा
मनुष्य के अनुशासन को खंडित करने वाले जो तत्व हैं उनमें प्रमुख भूमिका अंग्रेजी शिक्षा की है जिसने व्यक्ति के सोचने समझने की ताकत बुद्धि और विवेक पर ताला जड़ दिया है। सभ्यता और संस्कारों की बलि चढ़ाकर इसकी दासता को स्वीकार करना उचित नही है- सुबोध कुमार वर्मा
शिक्षा के बिना कोई समाज तथा राष्ट्र विकास नही कर सकता इसकी सार्थकता को बनाए रखना होगा। अधिकारों की मांग करने वाले समाज को कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहना चाहिए।
अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से विश्व में जहां भी व्यक्ति को अधिक भोग की सम्भावना प्रकट होगी, वहां जायेगा और उस देश का बनकर रह जाएगा। इससे सिर्फ भोग प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है- सुबोध कुमार वर्मा
आज़ादी के बाद आज हम कितने स्वतंत्र हुए हैं ? ये सवाल सबको स्वयं से पूछना चाहिए।जो व्यक्ति दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है वास्तव में वह स्वतंत्र नही है। सोचिए उस स्वतंत्रता का क्या मतलब है जिसमें व्यक्ति का स्वयं पर कोई अनुशासन ही नही रह जाता है। वास्तव में स्वतंत्रता का तात्पर्य स्वयं द्वारा निर्मित उस व्यवस्था से है जिसमें अनुशासन के साथ साथ स्वयं का सर्वांगीण विकास हो तथा परिवार समाज और राष्ट्र को इससे लाभ मिले तभी तो स्वतन्त्रता सार्थक होगी। जो व्यक्ति स्वयं पर शासन करने की कला में पारंगत हो वही स्वतन्त्र है। व्यक्ति के इस अनुशासन को खंडित करने वाले जो तत्व हैं उनमें प्रमुख भूमिका अंग्रेजी शिक्षा की है जिसने मनुष्य के अनुशासन को खंडित कर उसके विवेक और बुद्धि पर ताला जड़ दिया है। व्यक्ति की स्वतंत्रता में शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान है। शिक्षा तो गुलामी की बेड़ियों को तोड़ती है ये कौन सी शिक्षा है जो हमें लगातार गुलामी की ओर ले गयी। वर्तमान समय में समाज में स्वतंत्रता का मतलब कर्तव्यों और अनुशासन को भुलाकर सिर्फ अधिकारों के उपभोग तक सीमित मान लिया गया। जिसमें सारी व्यवस्थाएं अपने अनुकूल हो कुछ भी करने की खुली छूट हो वहीं तक स्वतंत्रता की सीमा को मान लिया है जबकि ये धारणा गलत है। वर्तमान समय में इन्सान खुद की स्वतंत्रता की आड़ में परिवार समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों और योगदान को भुलाकर अपनी आज़ादी का ढोल पीट रहा है। उसे ये आभास नही हुआ कि हम अंग्रेज़ो से तो आज़ाद हो गये लेकिन इसके साथ ही अंग्रेजी के गुलाम भी बन गये। अंग्रेजी की दासता में जकड़ा हुआ व्यक्ति स्वतंत्रता की मर्यादा को कभी नही समझ सकता। इसलिए समाज का हरेक व्यक्ति केवल अधिकारों के प्रति तो संवेदनशील है लेकिन कर्तव्यों का उसे कोई बोध नही है। जबकि कर्तव्य और अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं किसी एक पहलू के बिना सिक्के का कोई मूल्य नही रह जाता है। इसलिए अधिकारों की मांग करने वाले समाज को कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहना चाहिए। आज़ादी के बाद हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने वाली मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा ने तेज़ी से हमें अपनी गिरफ्त में जकड़ लिया। सनातन परम्परा को आगे बढ़ाने वाली शिक्षा पद्धति को छोड़कर अंग्रेजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने का प्रचलन समाज में तेजी से बढ़ा। ये स्टेटस सिंबल बन गया कि जिसके बच्चे महंगे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं वही वर्ग समाज में विशेष स्थान रखता है सामाजिक मान्यता के अनुसार वही वर्ग शिक्षित कहे जाने लगा जबकि वास्तव में समाज का यही शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाला वर्ग अपनी आवश्यकताओं से कहीं अधिक प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों का सबसे अधिक दोहन करता है। शिक्षा वही होती है जिसके द्वारा व्यक्ति स्वाबलंबी बने उसमें विवेक के साथ अपने ज्ञान का प्रयोग करने की क्षमता का विकास हो सभ्यता और संस्कृति के पोषण तथा सामाजिक सौहार्द की भावना प्रबल हो। संस्कार विहीन शिक्षा तो किसी के काम नही आती इससे किसी का कोई भला होने वाला नही है। समाज में प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट करने वाले वर्ग का सामूहिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। क्योंकि प्रकृति प्रदत्त साधन और संसाधन पर सबका अधिकार है। प्रकृति से कटकर जाने या अनजाने में ही सही लेकिन अंग्रेजी शिक्षा की चकाचौंध में व्यक्ति ऐसी दल-दल में फंसता चला गया है जहां से बच निकलने का उसके पास कोई चारा नही है। समय बीत जाता है और फिर लकीर को पीटने से कोई लाभ नही होगा। अभी समय है भूल सुधार की गुंजाइश है। बारीकी से सोचें तो महंगी अंग्रेजी शिक्षा से वास्तव में किसी को ऐसा कुछ भी नही मिला है जिस पर गर्व किया जा सके। अभी भी समय है कि हम अपनी सभ्यता संस्कृति समाज और राष्ट्र की रक्षा करने वाली बुनियादी शिक्षा पद्धति को अपनायें। ये सही है कि शिक्षा के विकास के बिना कोई समाज तथा राष्ट्र विकास नही कर सकता है। दुनिया का कोई भी देश जो आज आगे बढ़ा हुआ है उसे अपनी भाषा संस्कृति और परिवेश से लगाव रहा है। लेकिन भारत में शिक्षा का सवाल अतिभोग वादी संस्कृति से जुड़ा हुआ है। अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम का तात्पर्य उच्च नौकरी और भोग का पर्याय है। उन्हें अपने समाज की भाषा संस्कृति और परिवेश से क्या लेना-देना अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से विश्व में जहां भी उसे अधिक भोग की सम्भावना प्रकट होगी, वहां जायेगा और उस देश का बनकर रह जाएगा। इससे सिर्फ भोग प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। आधुनिक शिक्षा की गिरफ्त में जकड़े हुए परिवारों के बच्चों की बढ़ती हुई महत्वाकांक्षाओं और भोगवादी प्रवृत्ति से माता पिता को अन्त में कुछ मिलता है तो वह है बूढ़ी आंखों में नमी बेबसी लाचारी अकेलापन पश्चाताप और बेसब्री भरा अपनों का इंतजार। कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश परिवारों की यही कहानी है जो प्रायः देखी जा सकती है। अंग्रेजी शिक्षा की इस मनोवृत्ति को बदलना होगा वरना नया समाज बनाना सम्भव नही होगा। “बढ़ो यार दुनिया का हर रश्म सीखो।” ये बात सही है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा और आपसी संवाद के लिए अंग्रेजी आवश्यक है लेकिन सभ्यता और संस्कारों की बलि चढ़ाकर इसकी दासता को स्वीकार करना उचित नही है। अंग्रेजी तो वो खिड़की है जिससे दुनिया को समझना आसान है लेकिन मातृभाषा वह मुख्य द्वार है जो बच्चों के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करती है। बुद्धि के विकास के लिए विदेशी भाषा का बोझ सिर पर लादकर तो बच्चों की उगती हुयी शक्तियों का हृास ही होगा। इसलिए बच्चों को मातृभाषा में ही सरल और सहज शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो सके तथा उनमें प्रकृति परिवार समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना प्रबल हो सके। भारतीय सभ्यता और संस्कृति को पोषित करने वाली हमारी संस्कृत भाषा तो प्राचीन काल से ही वैश्विक स्तर पर हर क्षेत्र में चाहे वह साहित्य का क्षेत्र हो ज्ञान या विज्ञान का क्षेत्र हो या गणित का क्षेत्र हो सभी क्षेत्रों में पुख्ता प्रमाण के साथ इतिहास रचने वाली भाषा रही है इसके विकास पर बल दिया जाना चाहिए। भारतीय शिक्षा व्यवस्था से अलग हटकर प्राचीन ज्ञान और विज्ञान की तुलना में आज हमने कितना विकास किया है इसका आकलन करेंगे तो पायेंगे कि जीवन की इस यात्रा में हमने कितना कुछ ऐसा खो दिया है जिसकी भरपाई सम्भव नही है। हमें सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने वाली ऐसी भावी पीढ़ी का निर्माण करना है जिसमें शिक्षा के द्वारा संस्कार और समर्पण के साथ प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता तथा शांतिप्रिय समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान करने की प्रबल इच्छाशक्ति हो। इसके लिए सामूहिक प्रयास अनिवार्य हैं।


