इलेक्ट्रिक वाहनों की निर्माण प्रक्रिया में प्राकृतिक सम्पदा और पर्यावरण का भारी नुकसान होता है। इससे भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है। इनकी बैटरी बनाने की प्रक्रिया में प्राकृतिक ऊर्जा का बहुत उपयोग होता है। एक नई इलेक्ट्रिक कार के निर्माण में लगभग 4 टन कार्बन-डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन होता है, जो पारंपरिक कार के निर्माण से लगभग 40 प्रतिशत अधिक है। लिथियम और कोबाल्ट के खनन के लिए भारी मात्रा में पानी की खपत होती है और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचता है। भारतीय युवाओं में तो थोड़े समय में ही वाहनों के बदलने का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है इससे तो खतरा और भी बढ़ जाता है क्योंकि इस प्रचलन से नये वाहनों की मांग बढ़ेगी और पर्यावरण का भारी नुक़सान होगा। ईवी के निर्माण और प्रचलन से जल जंगल और ज़मीन की समस्याएं और भी तेजी से सामने आयेंगी- सुबोध कुमार वर्मा

भारत में किसी भी तकनीक को अपनाने से पहले उसके पर्यावरणीय प्रभावों का समुचित आकलन करना ही बुद्धिमानी है। हम सभी का पहला दायित्व है कि ऐसे संवेदनशील समाज का निर्माण करें जो अपने भोग-विलास की पद्धति से पर्यावरण पर कोई कुप्रभाव न पड़ने दे- सुबोध कुमार वर्मा
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क्या आप जानते हैं कि निर्माण के दौरान इलेक्ट्रिक वाहन EV हमारे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। इनके प्रचलन से वायु प्रदूषण, गरीब कचरे का प्रबंधन, तेजी से बढ़ती पानी की कमी की समस्याएं, जल प्रदूषण, वनों की गुणवत्ता में कमी जैवविविधता का नुक़सान भूमि और मिट्टी का क्षरण जैसी गम्भीर पर्यावरणीय समस्याएं और भी तेजी से हमारे सामने आयेंगी। वर्तमान समय में प्रदूषण, मृदा क्षरण, अत्यधिक जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधनों की कमी, अपशिष्ट उत्पादन, वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, महासागरों का अम्लीकरण और ओजोन परत का क्षरण कुछ ऐसे गम्भीर मुद्दे हैं जिनसे निपटने के लिए हम हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं। वायु प्रदूषण, कचरे का प्रबंधन, तेजी से बढ़ती पानी की कमी, गिरता भूजल लेवल, जल प्रदूषण, जल संरक्षण और वनों की गुणवत्ता, जैव विविधता के नुकसान और भूमि तथा मिट्टी का क्षरण जैसे प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दे वर्तमान समय की प्रमुख पर्यावरणीय समस्याएं हैं। वास्तव में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का निर्माण पारंपरिक (पेट्रोल/डीजल) वाहनों की तुलना में पर्यावरण के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण है। इनके निर्माण में बैटरी के लिए लिथियम, कोबाल्ट और निकिल जैसी धातुओं का खनन होता है जिससे प्रदूषण और बहुत अधिक मात्रा में जल की बर्बादी होती है। कोबाल्ट और लिथियम अवशेषों को विघटित होने में सदियाँ लग सकती हैं और ये मानव तथा पर्यावरण दोनों के स्वास्थ्य के लिये दीर्घकालिक खतरा उत्पन्न कर सकते हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी बनाने में, लिथियम, कोबाल्ट और निकिल जैसी आवश्यक सामग्रियों के खनन से कई गम्भीर पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न होती हैं। उदाहरण के लिए निकेल और कोबाल्ट के शोधन से सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) उत्सर्जन बढ़ सकता है, जिससे प्रदूषण के हॉटस्पॉट बन जाते हैं। इवी की निर्माण प्रक्रिया में प्राकृतिक सम्पदा और पर्यावरण का भारी नुकसान होता है। इससे भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है। इनकी बैटरी बनाने की प्रक्रिया बहुत ऊर्जा का गहन है। एक नई इलेक्ट्रिक कार के निर्माण में लगभग 4 टन कार्बन-डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन होता है, जो पारंपरिक कार के निर्माण से लगभग 40 प्रतिशत अधिक है। लिथियम और कोबाल्ट के खनन के लिए भारी मात्रा में पानी की खपत होती है और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचता है। देश में लिथियम, कोबाल्ट तथा EV बैटरी के लिये आवश्यक दुर्लभ पृथ्वी तत्त्वों जैसे महत्त्वपूर्ण कच्चे माल की सुरक्षित और विविध आपूर्ति का अभाव है इसलिए सोच समझ कर ही नीतियों को क्रियान्वित करना चाहिए क्योंकि भारत को लिथियम, कोबाल्ट और निकिल के नैतिक स्रोत के लिए तो अर्जेंटीना के साथ लिथियम-डील जैसी रणनीतिक साझेदारी विकसित करनी होगी। भारी बैटरी के कारण इलेक्ट्रिक वाहनों का वजन अधिक होता है जिससे टायरों के घिसने पर माइक्रोप्लास्टिक निकलता है। इलेक्ट्रिक वाहन आमतौर पर आंतरिक दहन इंजन वाहनों की तुलना में 15-20 प्रतिशत भारी होते हैं, क्योंकि बैटरी पैक का वज़न 300-900 किलोग्राम होता है जिससे टायर पर दबाव और घिसाब बढ़ जाता है। इलेक्ट्रिक वाहनों में तीव्र गति से घर्षण और गर्मी बढ़ती है, जिससे माइक्रोप्लास्टिक उत्सर्जन में वृद्धि होती है। एक इलेक्ट्रिक कार के उत्पादन प्रक्रिया के दौरान लगभग 4 टन CO2 उत्सर्जित होती है और लागत की भरपाई के लिए, वाहन का उपयोग कम से कम 8 वर्षों तक किया जाना चाहिए ताकि प्रतिवर्ष 0.5 टन उत्सर्जन को रोककर प्रारंभिक उत्सर्जन की भरपाई की जा सके। लेकिन भारतीय युवाओं में तो थोड़े समय में ही वाहनों के बदलने का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है इससे तो खतरा और भी बढ़ जायेगा क्योंकि इस प्रचलन से नये वाहनों की मांग बढ़ेगी और पर्यावरण का भारी नुक़सान होगा। पर्यावरणविदों का मानना है कि इलेक्ट्रिक वाहनों का वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी बैटरी को चार्ज करने के लिए बिजली कहाँ से आ रही है। यदि चार्जिंग के लिए कोयले से बनी बिजली का उपयोग होता है, तो उत्सर्जन कम होने की दर धीमी हो जाती है। इसके विपरीत सौर या पवन ऊर्जा (नवीकरणीय ऊर्जा) का उपयोग करने से इसका पर्यावरणीय लाभ कई गुना बढ़ जाता है। गंभीर रूप से, भारत में इस्तेमाल की गई लिथियम-आयन बैटरियों की अवैध डंपिंग को रोकने के लिये मज़बूत कानून का अभाव है। ई-अपशिष्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम 2011, ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम 2016 और वर्ष 2018 के संशोधन सहित मौजूदा कानूनी ढाँचा शामिल की गई सामग्रियों की श्रेणी के संदर्भ में विकसित हुआ है। हालाँकि यह इवी बैटरियों के सुरक्षित निस्तारण और पुनर्चक्रण के लिये एक सुसंगत समर्पित ढाँचा प्रदान करने में विफल रहता है। इस नियामक अंतराल के कारण भारत घरेलू और आयातित बैटरी अपशिष्ट का डंपिंग ग्राउंड बन सकता है। कार्बन उत्सर्जन, इसके प्रभाव और बैटरी निपटान पर निगरानी रखने के क्रम में इलेक्ट्रिक वाहनों के लिये एक समर्पित पर्यावरणीय प्रभाव एजेंसी की स्थापना करनी चाहिये। इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास को पर्यावरणीय स्थिरता के साथ संतुलित करने के लिये भारत को केवल विद्युतीकरण तक सीमित नहीं रहना चाहिये बल्कि हरित विद्युतीकरण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिये। ध्यान स्थायी बैटरी आपूर्ति शृंखलाओं, स्वच्छ ऊर्जा, पुनर्चक्रण और एकीकृत नगरीय नियोजन पर होना चाहिये। वैश्विक नेताओं से सीख लेकर और भारत की विशिष्ट चुनौतियों के अनुसार नीतियाँ बनाकर, देश यह सुनिश्चित कर सकता है कि इवी क्रांति न केवल उत्सर्जन को कम करे बल्कि एक स्वच्छ परिपत्र और जलवायु-प्रतिरोधी भविष्य का निर्माण भी करे। इसके लिए सबसे पहले हमें पेड़ पौधों की सुरक्षा के साथ धरती पर हरियाली फैलानी होगी। भारत में इवी का प्रचलन अभी शहरी परिवहन तक ही सीमित हैं जो धीरे-धीरे गांव की ओर भी फैल रहा है। लंबी दूरी के अंतर-शहर विद्युतीकरण के लिये व्यवहार्य रोडमैप का अभाव है। इसके अलावा चार्जिंग उपकरणों और बैटरी प्रौद्योगिकियों का कोई राष्ट्रीय मानकीकरण नहीं है जिसके परिणामस्वरूप इवी ब्रांडों तथा स्टेशनों में संगतता संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। एक चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने के लिये उच्च लागत का निवेश भी एक बड़ी बाधा है विशेष रूप से तब जब मांग या उपयोग की गारंटी न हो। इसलिए भारत में किसी भी तकनीक को अपनाने से पहले उसके पर्यावरणीय प्रभावों का समुचित आकलन करना ही बुद्धिमानी है। हम सभी का पहला दायित्व है कि ऐसे संवेदनशील समाज का निर्माण करें जो अपने भोग-विलास की पद्धति से पर्यावरण पर कोई कुप्रभाव न पड़ने दे। क्योंकि पर्यावरण स्वस्थ होगा तभी सारी कायनात सफल हो सकती है। संसार की कोई भी वस्तु जीवन से बढ़कर नही है। इसलिए जल जंगल और ज़मीन को दांव पर लगाकर विकास की गाथाएं नही लिखी जानी चाहिए।
सुबोध कुमार वर्मा प्रख्यात पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सहयोगी विश्वविख्यात पर्यावरणविद् और चिपको आन्दोलन के प्रणेता पद्मविभूषित पूज्य श्री सुंदरलाल बहुगुणा जी

