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मानसून की धीमी रफ्तार से किसान चिंतित, खेती और अर्थव्यवस्था पर बढ़ता असर

Shabdmail News
Last updated: June 20, 2026 12:41 pm
Shabdmail News
Published: June 20, 2026
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भारत में मानसून को देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। कृषि से लेकर पेयजल, बिजली उत्पादन और खाद्य सुरक्षा तक करोड़ों लोगों का जीवन मानसून पर निर्भर करता है। लेकिन वर्ष 2026 में मानसून की धीमी प्रगति और कई राज्यों में सामान्य से कम वर्षा ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। मौसम विभाग और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो खरीफ फसलों की बुवाई और उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। भारत की लगभग आधी से अधिक कृषि भूमि आज भी वर्षा आधारित है। ऐसे में मानसून की समय पर शुरुआत और पर्याप्त वर्षा किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। इस वर्ष जून माह में देश के कई हिस्सों में वर्षा सामान्य से कम दर्ज की गई है, जिससे खेतों में नमी की कमी देखी जा रही है। कई किसान बुवाई शुरू करने के लिए बारिश का इंतजार कर रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष एल-नीनो (El Niño) की स्थिति भी मानसून को प्रभावित कर रही है। भारतीय मौसम विभाग ने संकेत दिए हैं कि एल-नीनो के प्रभाव से मानसून कमजोर पड़ सकता है और कई क्षेत्रों में वर्षा सामान्य से कम रह सकती है। इससे धान, सोयाबीन, मक्का, कपास और दालों जैसी खरीफ फसलों पर असर पड़ने की आशंका है।

मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्यों में किसान बारिश की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कई क्षेत्रों में खेत तैयार हैं लेकिन पर्याप्त नमी न होने के कारण बुवाई शुरू नहीं हो पाई है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि मानसून में और देरी हुई तो किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर रुख करना पड़ सकता है। मानसून की कमजोरी का सीधा असर किसानों की आय पर पड़ता है। समय पर बुवाई नहीं होने से उत्पादन कम हो सकता है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। दूसरी ओर उत्पादन कम होने पर बाजार में खाद्यान्न की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका असर आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा। जलाशयों में घटते जलस्तर ने भी चिंता बढ़ा दी है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार देश के कई प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से काफी कम है। यदि पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकते हैं। कृषि मंत्रालय और राज्य सरकारें स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। कई जिलों में वैकल्पिक कृषि योजनाएं तैयार की जा रही हैं ताकि कम वर्षा की स्थिति में किसानों को राहत दी जा सके। सरकार किसानों को सूखा सहन करने वाली फसलें अपनाने, जल संरक्षण और आधुनिक सिंचाई तकनीकों का उपयोग करने की सलाह दे रही है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मानसून अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई में अच्छी बारिश होने पर स्थिति में सुधार संभव है। भारत में कई बार मानसून की शुरुआत धीमी रहती है लेकिन बाद में वर्षा सामान्य स्तर तक पहुंच जाती है। इसलिए किसानों को घबराने के बजाय मौसम विभाग की सलाह के अनुसार कृषि कार्य करने की आवश्यकता है। मानसून केवल खेती ही नहीं बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। अच्छी बारिश होने पर कृषि उत्पादन बढ़ता है, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ता है और बाजारों में मांग मजबूत होती है। वहीं कमजोर मानसून महंगाई बढ़ाने और आर्थिक विकास की गति को प्रभावित करने का कारण बन सकता है। जलवायु परिवर्तन भी मानसून के स्वरूप को बदल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी लंबे सूखे की स्थिति देखने को मिली है। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में किसानों को मौसम आधारित कृषि तकनीकों को अपनाना होगा ताकि बदलते मौसम के प्रभाव को कम किया जा सके। फिलहाल देशभर के किसान आसमान की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं। समय पर और पर्याप्त बारिश ही उनकी मेहनत को सफल बना सकती है। आने वाले कुछ सप्ताह न केवल किसानों बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं। यदि मानसून रफ्तार पकड़ता है तो कृषि क्षेत्र को राहत मिलेगी, अन्यथा चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।

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