योगेश कुमार : शब्द मेल छत्तीसगढ़
लैलूंगा, कटकलिया। ग्राम पंचायत कटकलिया के फोकटपारा और राजूनगर की सड़कें पहली ही बारिश में फिर दलदल में बदल गईं। ऐसा लगता है कि यहां विकास केवल भाषणों, पोस्टरों और चुनावी मंचों तक ही सीमित है। धरातल पर उतरते ही विकास के सारे दावे कीचड़ में धंस जाते हैं।
दोनों मोहल्लों का यही मुख्य मार्ग है, जहां से रोज़ स्कूली बच्चे, किसान, मजदूर, महिलाएं और बुजुर्ग गुजरते हैं। लेकिन सड़क की हालत देखकर ऐसा महसूस होता है कि यह रास्ता नहीं, बल्कि धैर्य और मजबूरी की परीक्षा है। हर कदम पर गड्ढा, हर मोड़ पर कीचड़ और हर बारिश के साथ वही पुरानी कहानी दोहराई जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से सड़क सुधार की मांग की जा रही है। सीसी सड़क की बात छोड़ दीजिए, बरसात से पहले थोड़ा-सा मुरूम भी नसीब नहीं हो सका। आश्वासनों की बारिश जरूर होती रही, लेकिन सड़क पर एक फावड़ा मुरूम तक नहीं गिरा।
चुनाव आते ही विकास की गंगा बहने के दावे किए जाते हैं, लेकिन पहली बारिश उन दावों को बहाकर ले जाती है। कीचड़ से लथपथ सड़कें मानो खुद सवाल पूछ रही हों—क्या विकास सिर्फ मंचों की तालियों तक सीमित है? क्या ग्रामीणों की परेशानी केवल चुनावी भाषणों का विषय बनकर रह जाएगी?
स्कूल जाने वाले बच्चों के जूते रोज़ कीचड़ में धंसते हैं, बुजुर्ग गिरने के डर से घरों में कैद हो जाते हैं और मरीजों को अस्पताल पहुंचाना किसी परीक्षा से कम नहीं रहता। यह स्थिति किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे समय से उपेक्षित बुनियादी सुविधाओं की कहानी बयां करती है।
फोकटपारा और राजूनगर के ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें भाषण नहीं, सड़क चाहिए; आश्वासन नहीं, मुरूम चाहिए; और घोषणाएं नहीं, ज़मीन पर काम चाहिए। क्योंकि जनता अब वादों की नहीं, काम की सड़क पर चलना चाहती है।

