नई दिल्ली, 14 जून। भारत में मानसून केवल एक मौसम नहीं, बल्कि देश की कृषि, अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। हर वर्ष जून से सितंबर तक होने वाली बारिश देश की खेती, जलाशयों, बिजली उत्पादन और पेयजल व्यवस्था को प्रभावित करती है। ऐसे में भारतीय मौसम विभाग (IMD) द्वारा जारी हालिया आकलन ने किसानों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 2026 के मानसून सीजन में मध्यम से मजबूत एल-नीनो (El Niño) प्रभाव देखने को मिल सकता है, जिससे देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका जताई जा रही है।
क्या है एल-नीनो?
एल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि की एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। जब समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है तो इसका असर पूरी दुनिया के मौसम चक्र पर पड़ता है। भारत में एल-नीनो का सीधा संबंध मानसून से माना जाता है। आमतौर पर एल-नीनो की स्थिति बनने पर मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और वर्षा सामान्य से कम होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कई दशकों के आंकड़ों में देखा गया है कि अधिकांश कमजोर मानसून वर्षों के पीछे एल-नीनो का प्रभाव रहा है। हालांकि हर बार इसका असर समान नहीं होता, लेकिन इस बार इसके मध्यम से मजबूत होने की संभावना ने चिंताएं बढ़ा दी हैं।
कृषि क्षेत्र पर सबसे बड़ा खतरा
भारत की लगभग 55 प्रतिशत कृषि भूमि आज भी वर्षा आधारित है। ऐसे में यदि मानसून कमजोर पड़ता है तो इसका सबसे बड़ा असर किसानों पर दिखाई देगा। खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, मूंगफली और दालों की बुवाई मानसून पर निर्भर करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है तो बुवाई क्षेत्र घट सकता है और उत्पादन में कमी आ सकती है। इससे खाद्यान्न कीमतों में वृद्धि तथा किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विशेष रूप से मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में किसानों की चिंता बढ़ गई है।
जल संकट की आशंका
कम बारिश का प्रभाव केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा। देश के प्रमुख बांधों, जलाशयों और भूजल स्तर पर भी इसका असर पड़ सकता है। कई शहरों में पेयजल संकट गहरा सकता है और ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता चुनौती बन सकती है।
जल विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो गर्मी के मौसम में जल संकट और अधिक गंभीर हो सकता है। इसके अलावा कई नदियों के जलस्तर में भी कमी आने की संभावना है, जिससे सिंचाई परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
बिजली उत्पादन पर भी असर
भारत में बड़ी मात्रा में बिजली उत्पादन जलविद्युत परियोजनाओं से होता है। यदि जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं पहुंचेगा तो बिजली उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है। इससे ऊर्जा क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा और कई राज्यों में बिजली आपूर्ति को लेकर चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं।
सरकार और मौसम विभाग की तैयारी
भारतीय मौसम विभाग लगातार समुद्री तापमान और वैश्विक मौसम प्रणालियों की निगरानी कर रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों ने भी संभावित स्थिति से निपटने के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर प्रोत्साहित करने, जल संरक्षण अभियान चलाने और सिंचाई सुविधाओं को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि वे मौसम पूर्वानुमानों पर नजर रखें और स्थानीय कृषि विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें। इससे संभावित नुकसान को कम किया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन भी बढ़ा रहा चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि एल-नीनो के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन भी मौसम की अनिश्चितताओं को बढ़ा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में अत्यधिक वर्षा, सूखा, बाढ़ और तापमान में असामान्य वृद्धि जैसी घटनाएं अधिक देखने को मिली हैं। ऐसे में भविष्य में मौसम की भविष्यवाणी और जल प्रबंधन की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।
किसानों के लिए सावधानी जरूरी
कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे जल संरक्षण तकनीकों को अपनाएं, सूखा-रोधी बीजों का उपयोग करें और मौसम आधारित खेती की रणनीति तैयार करें। इससे कम वर्षा की स्थिति में भी उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सकता है।
निष्कर्ष
वर्ष 2026 का मानसून भारत के लिए कई चुनौतियां लेकर आ सकता है। एल-नीनो के संभावित प्रभाव ने कृषि, जल संसाधन और ऊर्जा क्षेत्रों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन सावधानी और बेहतर तैयारी के माध्यम से संभावित जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आने वाले सप्ताहों में मानसून की प्रगति पर पूरे देश की नजरें टिकी रहेंगी।

