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उत्तर प्रदेश

आस्था की अमिट पहचान: 500 वर्षों से श्रद्धा का केंद्र बना सिंघौली का श्री महावीर विराजमान मंदिर

Shabdmail News
Last updated: July 6, 2026 4:14 pm
Shabdmail News
Published: July 6, 2026
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गगनेश तिवारी ब्यूरो : शब्द मेल समाचार बिल्हौर कानपुर नगर

बिल्हौर/अरौल। समय बदलता गया, पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन अरौल थाना क्षेत्र के ग्राम सिंघौली में स्थित श्री महावीर विराजमान मंदिर की आस्था आज भी उतनी ही अटूट है, जितनी सदियों पहले थी। लगभग 500 वर्ष पुराने इस मंदिर में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों का दृढ़ विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से यहां अपनी मनोकामना लेकर आता है, श्री महावीर जी की कृपा से उसकी इच्छा अवश्य पूरी होती है।

तीन मंदिरों की स्थापना से जुड़ा है इतिहास

ग्रामीणों और क्षेत्र के बुजुर्गों के अनुसार लगभग 500 वर्ष पूर्व एक महान संत ने इस क्षेत्र में तीन प्रमुख मंदिरों की स्थापना की थी। इनमें पहला और सबसे प्रमुख मंदिर ग्राम सिंघौली में स्थापित श्री महावीर विराजमान मंदिर है, जिससे लगभग 17 बीघा भूमि जुड़ी हुई है। दूसरा मंदिर बरांडा गांव तथा तीसरा मंदिर गंगा तट के समीप हाशिमपुर में स्थापित किया गया। तीनों मंदिरों की अपनी अलग धार्मिक मान्यता और आध्यात्मिक महत्ता है, जिसके कारण यहां वर्षभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

संतों की तपस्या ने बढ़ाया मंदिर का गौरव

मंदिर का इतिहास अनेक संतों की तपस्या और सेवा से जुड़ा रहा है। क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि लगभग एक शताब्दी पूर्व लम्बे नारायण बाबा ने करीब 50 वर्षों तक मंदिर की सेवा की। उनके बाद कमली वाले बाबा ने मंदिर की परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्ष 1970 के दशक में श्री जमुनादास जी महाराज ने मंदिर की बागडोर संभाली और वर्ष 2000 तक निरंतर सेवा करते हुए श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन किया। वर्ष 2000 में उनके ब्रह्मलीन होने के बाद लगभग 14 वर्षों तक मंदिर में कोई स्थायी संत नहीं रहा।

महंत ओमदास जी ने संभाली सेवा की जिम्मेदारी

वर्ष 2014 में महंत श्री ओमदास जी महाराज का मंदिर में आगमन हुआ। कानपुर देहात के रनिया में जन्मे ओमदास जी महाराज ने मात्र 12 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन का त्याग कर संत मार्ग अपना लिया। उन्होंने वर्षों तक विभिन्न आश्रमों में रहकर साधना और सेवा की तथा बाद में सिंघौली के श्री महावीर विराजमान मंदिर की सेवा का दायित्व संभाला। उनके सान्निध्य में मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों, भंडारों और श्रद्धालुओं की सुविधाओं का विस्तार हुआ है।

हर शुभ कार्य की शुरुआत यहीं से

गांव के लोगों का कहना है कि विवाह, गृह प्रवेश, खेती-बाड़ी, व्यापार या किसी भी नए कार्य की शुरुआत से पहले वे सबसे पहले श्री महावीर जी के दरबार में माथा टेकते हैं। उनका विश्वास है कि बाबा का आशीर्वाद मिलने के बाद हर कार्य सफल होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

दूर-दूर से उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

मंगलवार और शनिवार को मंदिर में विशेष भीड़ देखने को मिलती है। इसके अलावा हनुमान जयंती एवं अन्य धार्मिक अवसरों पर हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का भी प्रमुख केंद्र बन चुका है।

सदियों पुरानी आस्था, संतों की तपस्या और श्रद्धालुओं के अटूट विश्वास का यह संगम आज भी सिंघौली के श्री महावीर विराजमान मंदिर को क्षेत्र की धार्मिक पहचान बनाए हुए है।

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