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उत्तर प्रदेश

अलीगढ़ में शांतिपूर्ण धरना या पुलिस की सख्ती? भारतीय कश्यप सेना संगठन ने उठाए गंभीर सवाल

Shabdmail News
Last updated: July 3, 2026 2:32 pm
Shabdmail News
Published: July 3, 2026
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जितेन्द्र सिंह जीतू आगरा मंडल प्रभारी शब्द मेल समाचार

अलीगढ़। भारतीय कश्यप सेना संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रताप सिंह खालसा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अमित कश्यप तथा संगठन के अन्य पदाधिकारियों के साथ पुलिस के व्यवहार को लेकर विवाद गहरा गया है। संगठन का आरोप है कि 1 जुलाई 2026 को डीआईजी कार्यालय पर आयोजित शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने अभद्र भाषा का प्रयोग किया, बलपूर्वक कार्रवाई की और कई पदाधिकारियों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज कर दिए।

संगठन का कहना है कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में अलीगढ़ के सीओ सर्वम सिंह कथित तौर पर कहते सुनाई दे रहे हैं— “तुम्हारा इलाज कर देंगे, तुम्हें नेता बना देंगे, तुम्हारी हेकड़ी निकाल देंगे।” संगठन का सवाल है कि यदि वीडियो सही है, तो क्या किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक पुलिस अधिकारी द्वारा किसी सामाजिक संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष से इस प्रकार की भाषा का प्रयोग उचित माना जा सकता है?

संगठन का कहना है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियार के एकत्र होकर सभा करने का अधिकार प्रदान करता है। हालांकि ये अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के हित में लगाए गए उचित प्रतिबंधों के अधीन होते हैं।

संगठन के अनुसार, धरना-प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रताप सिंह खालसा ने मंच से सभी कार्यकर्ताओं से स्पष्ट अपील की थी कि कोई भी सड़क जाम न करे, कानून अपने हाथ में न ले और संविधान के दायरे में रहकर पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करे। संगठन का दावा है कि प्रदर्शन के दौरान जब एक एंबुलेंस वहां से गुजरी तो कार्यकर्ताओं ने तत्काल रास्ता खाली कर उसे प्राथमिकता के साथ निकलने दिया।

यह पूरा विवाद उस मामले से जुड़ा बताया जा रहा है जिसमें संगठन ने पहले एसपी कार्यालय में ज्ञापन देकर आरोप लगाया था कि उनके द्वारा सौंपा गया ज्ञापन कथित रूप से फाड़ दिया गया था। संगठन का कहना है कि इसी मामले में डीआईजी को ज्ञापन देने के लिए 1 जुलाई को धरना आयोजित किया गया था।

संगठन का आरोप है कि डीआईजी कार्यालय पर शांतिपूर्ण धरना चल रहा था, लेकिन पुलिस ने प्रदर्शन समाप्त कराने के लिए बल प्रयोग किया और कई पदाधिकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। संगठन का कहना है कि उन पर लगाए गए मुकदमे झूठे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और पुलिस की ओर से इस संबंध में आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना अभी शेष है।

कुछ स्थानीय सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि कार्रवाई के पीछे अन्य कारण हो सकते हैं, लेकिन इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इनकी सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

अब कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े हो रहे हैं—

– यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, तो बल प्रयोग की आवश्यकता क्यों पड़ी?
– वायरल वीडियो में सुनाई दे रही कथित भाषा पर क्या विभागीय जांच होगी?
– गिरफ्तार किए गए लोगों पर दर्ज मुकदमों की निष्पक्ष जांच कौन करेगा?
– क्या पुलिस और प्रदर्शनकारियों, दोनों की भूमिका की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
– यदि किसी पक्ष ने कानून का उल्लंघन किया है, तो उसके विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई कब होगी?

लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, वहीं कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। ऐसे मामलों में आवश्यक है कि सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच हो, दोनों पक्षों की बात सुनी जाए और जो भी दोषी पाया जाए, उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। इससे जनता का न्याय व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास बना रहेगा।

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